नमस्कार मित्रों, में हूँ sujeet Patel। स्वागत करता हूँ आप सभी का एक news में जहाँ हम बात करेंगे एक बहुत ही अहन विषय पर अमेरिका द्वारा भारत को धोखा देने की कोशिश और रूस का उस पर जवाब। हाल ही में जब अमेरिका ने भारत को लेकर एक नई नीति अपनाई, जो भारत के हितों के खिलाफ मानी जा रही है, तब रूस ने जिस तरह से रिएक्ट किया है, वो यह दर्शाता है कि अब ग्लोबल पावर स्ट्रक्चर में बड़े बदलाव आ रहे हैं।रूस ने जिस तरीके से अमेरिका को जवाब दिया, वह न केवल भारत के लिए एक समर्थन का संकेत है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कैसे रूस अपने पुराने मित्र भारत के साथ खड़ा है। यह सब तब हुआ जब अमेरिका ने CAATSA (Countering America’s Adversaries Through Sanctions Act) जैसे कानून के तहत भारत पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की, क्योंकि भारत रूस से S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीद रहा है।लेकिन रूस ने साफ कर दिया कि वह भारत के साथ अपने रिश्ते को कमजोर नहीं करेगा, चाहे अमेरिका कुछ भी कर ले। जब सवाल यह उठता है क्या अमेरिका की इस नीति से भारत को नुकसान होगा? या फिर भारत को रूस जैसे पुराने सहयोगी के साथ और गज़बूती से खड़ा होना पाहिए?
भारत ने अमेरिका की चेतावनियों को दरकिनार करते हुए साफ कहा कि वह अपनी रक्षा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए रूस के साथ रक्षा समझौते करता रहेगा। यह बयान भारत सरकार की तरफ से इसलिए भी अहम था क्योंकि भारत एक स्वतंत्र विदेश नीति पर यकीन करता है। अमेरिका ने जिस तरीके से रूस पर दबाव बनाने की कोशिश की, उससे साफ था कि वह भारत पर भी अप्रत्यक्ष दबाव बनाना चाहता है।लेकिन रूस ने इस पूरे मामले में एक जबरदस्त रणनीतिक चाल चली। रूस ने अमेरिका को चेतावनी दी कि अगर वह भारत पर किसी भी तरह का दबाव बनाएगा, तो रूस अन्य देशों को अमेरिका के खिलाफ लामबंद करेगा। यह एक तरह से अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से नुकसानदायक हो सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे खास बात यह रही कि रूस ने सार्वजनिक मंचों पर भारत की सुरक्षा और रक्षा जरूरतों का समर्थन किया। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सहित अन्य मंर्चों पर भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का बचाव किया और यह भी कहा कि भारत को ये अधिकार है कि वह अपनी सुरक्षा के लिए जो भी साझेदार चुने, उसमें किसी तीसरे देश को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।दूसरी ओर, अमेरिका के अंदर भी कई थिंक टैंक और विशेषज्ञों ने यह माना कि भारत पर प्रतिबंध लगाना अमेरिका की बड़ी भूल होगी क्योंकि भारत को चीन के खिलाफ एक अहम साझेदार के रूप में देखा जा रहा है।भाग
रूस ने अब एक कदम आगे बढ़ाते हुए भारत के साथ नए रक्षा समझौतों पर चर्चा शुरू कर दी है। इसमें नए फाइटर जेट्स, मिसाइल सिस्टम और जॉइंट वेंचर शामिल हैं। यह दिखाता है कि रूस भारत को न केवल एक ग्राहक बल्कि एक भरोसेमंद मित्र के रूप में देखता है।अमेरिका की ये रणनीति कि वह भारत को चीन के खिलाफ अपने साथ रखे, लेकिन साथ ही भारत पर प्रतिबंध भी लगाए यह स्वयं में विरोधाभासी है। भारत ने भी अमेरिका को यह संदेश दे दिया है कि वह किसी दबाव में नहीं आएगा।
इस दौरान रूस ने अमेरिका को एक और झटका दिया। उन्होंने चीन और भारत के साथ एक त्रिपक्षीय सुरक्षा वार्ता की बात शुरू की। यह प्रस्ताव अमेरिका के लिए बड़ी चिंता का विषय बन गया क्योंकि अगर रूस, भारत और चीन किसी भी सुरक्षा सहयोग की दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो यह अमेरिका की एशिया रणनीति के लिए करारा डाटका होगा।रूस ने साथ ही अपने ऊर्जा निर्यात को भारत की ओर मोड़ दिया। अमेरिका ने जब रूस पर प्रतिबंध लगाए, तो रूस ने भारत को सस्ते दार्मा पर कच्चा तेल बेचना शुरू किया, जिससे भारत को आर्थिक रूप से भी लाभ हुआ।
रूस ने अब भारत को एक रणनीतिक संकेत देते हुए अपने रक्षा उपकरणों की तकनीक ट्रांसफर करने की बात कही है। यह अमेरिका के लिए बड़ा झटका था क्योंकि अमेरिका अपने रक्षा सामान की तकनीक साझा नहीं करता। इससे भारत को आत्मनिर्भर बनने में सहायता मिलेगी।यह ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी भारत के लिए ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में बडा कदम होगा। रूस के इस कदम को भारत में बहुत सकारात्मक रूप से देखा गया।
अमेरिका ने फिर भी जब दबाव बनाने की कोशिश की, तो रूस ने भारत के साथ एक नया तेल और गैस समझौता साइन कर दिया। अब भारत सीधे रूस से तेल और गैस खरीद सकता है, डॉलर के बजाय स्थानीय करेंसी में व्यापार करके इससे अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम होती जा रही है।यह एक आर्थिक बदला था अमेरिका ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए, और रूस ने भारत को आर्थिक रूप से मजबूत करने का जरिया बना लिया।
भारत ने भी अपने कूटनीतिक दांव चलने शुरू कर दिए। भारत ने रूस और अमेरिका दोनों के साथ संतुलन बनाने की नीति अपनाई लेकिन रूस के साथ रिश्तों को और मजबूत करना शुरू कर दिया। यह दिखाता है कि भारत अब वैश्विक मंच पर किसी के दबाव में नहीं है।भारत ने स्पष्ट कर दिया कि वह अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार निर्णय लेगा और वैश्चिक महाशक्तियों की ‘या तो हमारे साथ या हमारे खिलाफ’ वाली सोच को नहीं मानेगा।
इस पूरे घटनाक्रम से यह साबित हुआ कि भारत अब एक ‘बैलेंसर’ की भूमिका निभा रहा है जो अमेरिका और रूस के बीच में संतुलन बनाए हुए है लेकिन अपने हितों से समझौता नहीं कर रहा। इस पूरे घटनाक्रम में रूस ने भारत को जिस तरह से समर्थन दिया, वह एक ऐतिहासिक उदाहरण बन गया।भारत और रूस के संबंध केवल रक्षा तक सीमित नहीं हैं अब यह ऊर्जा, विज्ञान, अंतरिक्ष और व्यापार तक फैल रहे हैं। रूस ने यह दिखा दिया कि वह भारत के साथ खड़ा रहेगा।
अंत में, यह स्पष्ट हो गया कि अमेरिका ने भले ही भारत पर दबाव डालने की कोशिश की हो, लेकिन रूस ने उसे करारा जवाब दिया। रूस का यह रुख भारत के लिए भी एक संकेत है कि पुराने मित्र कठिन समय में साथ आतेभारत ने भी इस मौके का लाभ उठाते हुए अपने पुराने मित्र के साथ रिश्तों को और प्रगाढ़ बना लिया है। यही है आज की वैश्विक राजनीति जहाँ ताकत और आत्मनिर्भरता सबसे बड़ी मुद्रा है।

